क्या मीडिया चेहरा, चरित्र और चाल जन हित में बदलेगा?

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भारतीय मीडिया एक ऐसे दौर से गुजर रहा है जहां उसकी भूमिका, विश्वसनीयता और इरादों पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं। एक तरफ मीडिया लोकतंत्र का चौथा स्तंभ माना जाता है, वहीं दूसरी तरफ उसकी चेहरा, चरित्र और चाल को लेकर जनता में गहरी नाराज़गी और अविश्वास तेजी से बढ़ा है। ऐसे में बड़ा सवाल यह है—क्या मीडिया आने वाले समय में अपनी दिशा और प्राथमिकताएँ सच में बदल पाएगा?

बीते कुछ वर्षों में खबरों का स्वरूप तेजी से बदला है। कई चैनलों पर बहसें तथ्य आधारित संवाद की बजाय राजनीतिक प्रोपेगेंडा, उत्तेजक नैरेटिव और टीआरपी आधारित प्रस्तुतियों में बदल गई हैं। मुद्दे चाहे सामाजिक हों, आर्थिक हों या राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े, अक्सर तथ्यों की जगह सनसनी और पक्षपात प्रमुख हो जाते हैं।

आलोचकों का कहना है कि मीडिया का चरित्र तब तक नहीं बदल सकता जब तक उसकी आर्थिक संरचना, स्वामित्व मॉडल और संपादकीय स्वतंत्रता में सुधार न आए। विज्ञापन-आधारित मॉडल ने पत्रकारिता को बाजार और सत्ता दोनों के प्रभाव में धकेल दिया है, जिससे जनहित की खबरें हाशिये पर चली जाती हैं।

मीडिया का चाल, यानी उसकी कार्यशैली, भी सवालों के घेरे में है। एक ओर फेक न्यूज़ और आधी-अधूरी जानकारी का प्रसार बढ़ा है, वहीं दूसरी ओर संवेदनशील मुद्दों को भी राजनीतिक चश्मे से दिखाया जाने लगा है। इससे समाज में न केवल भ्रम फैलता है, बल्कि जनमत भी विभाजित होता है।

इसके बावजूद मीडिया सुधार की उम्मीद खत्म नहीं हुई है। डिजिटल प्लेटफॉर्मों पर स्वतंत्र पत्रकारिता, फैक्ट-चेकिंग संस्थानों का उभरना और जनता का बढ़ता जागरूक रवैया दिखाता है कि बदलाव की मांग व्यापक है। यदि मीडिया संस्थान सच में अपनी विश्वसनीयता वापस पाना चाहते हैं, तो उन्हें जनहित को केंद्र में रखते हुए पारदर्शिता, तथ्य और निष्पक्षता को प्राथमिकता देनी ही होगी।

लोकतंत्र तभी मजबूत होगा जब मीडिया अपनी मूल जिम्मेदारी—सत्य को सामने लाना और जनता के हितों की रक्षा करना—को ईमानदारी से निभाएगा। अब यह मीडिया पर निर्भर है कि वह अपनी छवि सुधारने की दिशा में कदम बढ़ाता है या नहीं।

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