बाहुबली को टिकट क्यों?

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भारतीय राजनीति हमेशा से प्रतीकात्मकता और जनभावनाओं का खेल रही है। ऐसे में जब किसी मशहूर फ़िल्म किरदार या एक काल्पनिक नायक के नाम पर राजनीतिक टिकट बांटा जाता है, तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है––‘बाहुबली को टिकट क्यों?’ इस सवाल के पीछे छिपा संदेश असल में जनता की भावनाओं को हवा देने का है।

‘बाहुबली’ फिल्म ने भारतीय समाज की कल्पना में एक शक्तिशाली, न्यायप्रिय और जनता का मसीहा कहे जाने वाले नेता की छवि बनाई। राजनीति में भी कई नेता या उम्मीदवार खुद को ऐसे ही “जननायक” के रूप में पेश करने की कोशिश करते हैं। ‘बाहुबली’ की लोकप्रियता ने यह साफ़ कर दिया कि आज की राजनीति में सिनेमा और पॉप कल्चर का प्रभाव कितना गहरा है।

राजनीतिक दल जब किसी बाहुबली जैसी छवि वाले व्यक्ति को टिकट देते हैं, तो उनका मकसद स्पष्ट होता है—मतदाताओं की भावनाओं को जगाना और चुनावी मैदान में एक बड़ा चेहरा खड़ा करना। यह एक तरह से जनता की मनोविज्ञान को समझकर उठाया गया कदम है, जहां ताकत, निडरता और वीरता के प्रतीक को वोट बैंक में तब्दील किया जाता है।

समाज के एक बड़े हिस्से में यह धारणा भी है कि ‘बाहुबली’ जैसे किरदार न्याय और व्यवस्था स्थापित करने में सक्षम होते हैं। हालांकि, असल जिंदगी की राजनीति में यह किरदार सिर्फ़ एक ‘ब्रांड’ बनकर ही रह जाता है, क्योंकि असली चुनाव असली चुनौतियों के लिए होते हैं, जहां फैंटेसी नहीं बल्कि नीति और नेतृत्व की कसौटी काम आती है।

ऐसे में ‘बाहुबली’ को टिकट देना सिर्फ़ एक रणनीतिक दांव है, जहां फिल्मों की चमक और नेतृत्व की छवि को मिलाकर जनता के दिलों को जीतने की कोशिश की जाती है।


 

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