ग्रामीण भारत के खाली स्कूलों पर बड़ा सवाल — शिक्षा व्यवस्था में आखिर कमी कहां है?

0

देश के कई ग्रामीण इलाकों में सरकारी स्कूलों की इमारतें खड़ी हैं, शिक्षक तैनात हैं, लेकिन कक्षाओं में छात्र नहीं दिखाई देते। यह स्थिति न केवल शिक्षा तंत्र की विफलता को उजागर करती है, बल्कि ग्रामीण समाज में बढ़ती उदासीनता का भी प्रतीक बन चुकी है। सवाल उठता है — जब संसाधन मौजूद हैं, तो बच्चे स्कूल क्यों नहीं जा रहे?

शिक्षा विभाग के आंकड़े बताते हैं कि हजारों सरकारी प्राथमिक और माध्यमिक विद्यालयों में छात्र संख्या बेहद कम है। कई जगहों पर विद्यालयों में रोज़ाना दो से पाँच बच्चे ही पहुंचते हैं, जबकि शिक्षक पूर्ण वेतन पा रहे हैं। अभिभावक अपने बच्चों को या तो निजी स्कूलों में भेज रहे हैं या फिर आर्थिक मजबूरियों के कारण उन्हें मजदूरी में लगा रहे हैं।

शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि इसका सबसे बड़ा कारण सरकारी स्कूलों में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा का अभाव है। शिक्षण पद्धति पुरानी है, सुविधाएं सीमित हैं और कई जगहों पर शिक्षकों की उपस्थिति तो है, लेकिन पढ़ाई का वास्तविक माहौल नहीं बन पाया।

सरकार ने स्कूल शिक्षा को सशक्त करने के लिए ‘समग्र शिक्षा अभियान’ जैसे कार्यक्रम शुरू किए हैं, लेकिन इनका असर जमीनी स्तर पर अपेक्षित नहीं दिखता। ग्रामीण क्षेत्रों में अभिभावकों को जागरूक करने और शिक्षा के प्रति भरोसा जगाने की ज़रूरत है।

शिक्षा नीति विशेषज्ञों का कहना है कि जवाबदेही केवल शिक्षकों या प्रशासन की नहीं, बल्कि समाज की भी है। जब तक शिक्षा को प्राथमिक ज़रूरत नहीं माना जाएगा, तब तक स्कूलों में बच्चों की कमी का यह संकट बना रहेगा।

 

Leave A Reply

Your email address will not be published.