भारत का सबसे प्राचीन खगोल ग्रंथ ‘महासलिलम्’ पुनः खोजा गया

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भारतीय विज्ञान और खगोलशास्त्र के इतिहास में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर स्थापित करते हुए, ‘महासलिलम्’ नामक प्राचीन खगोल ग्रंथ का पुनः अन्वेषण हुआ है। यह ग्रंथ भारत की वैज्ञानिक परंपरा का जीवंत उदाहरण माना जा रहा है, जो वैदिक काल से भी पूर्व के खगोलीय ज्ञान को उजागर करता है।

ग्रंथ की खोज और महत्व

‘महासलिलम्’ की पांडुलिपि एक प्राचीन मंदिर के भूले-बिसरे पुस्तकालय में मिली, जहां इसे सैकड़ों वर्षों तक सुरक्षित रखा गया था। संस्कृत में लिखे इस ग्रंथ में नक्षत्रों, खगोलीय पिंडों की गति, ग्रहण चक्र और सृष्टि के जल-तत्व सिद्धांतों पर विस्तृत विवरण है। विशेषज्ञों के अनुसार, यह ग्रंथ आर्यभट और वराहमिहिर से भी पूर्व के खगोल सिद्धांतों की झलक देता है।

वैज्ञानिकों की प्रतिक्रिया

भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) और संस्कृत विद्वानों ने संयुक्त रूप से इसका प्रारंभिक अध्ययन किया है। खगोलविदों का मानना है कि महासलिलम् में वर्णित ग्रह-नक्षत्रों की गणना अद्भुत रूप से सटीक है, जो प्राचीन भारत की वैज्ञानिक दक्षता को प्रमाणित करती है।

सांस्कृतिक और ज्ञान परंपरा का पुनर्जागरण

इस खोज ने भारत की प्राचीन ज्ञान परंपरा को पुनः जीवित कर दिया है। महासलिलम् न केवल एक खगोल ग्रंथ है, बल्कि इसमें दार्शनिक और आध्यात्मिक पहलू भी शामिल हैं, जो ब्रह्मांड के निर्माण और उसके चक्रों की व्याख्या करते हैं। इस ग्रंथ की पुनः खोज भारतीय युवाओं के लिए प्रेरणा का स्रोत बन सकती है।

संरक्षण और अनुवाद की पहल

कार्यकर्ताओं ने इस अमूल्य पांडुलिपि के संरक्षण और डिजिटलीकरण की मांग की है। साथ ही, इसे विभिन्न भाषाओं में अनुवाद कर आम जन तक पहुंचाने की योजना भी बनाई जा रही है, ताकि भारत की प्राचीन वैज्ञानिक परंपरा को वैश्विक मंच पर स्थापित किया जा सके।


 

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