दिल्ली ब्लास्ट की आड़ में नैरेटिव की साज़िश : मीडिया का खतरनाक खेल
दिल्ली में हाल ही में हुए ब्लास्ट ने देशभर को झकझोर दिया है। लेकिन इस दर्दनाक घटना के बीच मीडिया के एक हिस्से ने जिस तरह से खबरों की प्रस्तुति की, उसने कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। आतंकवाद जैसे गंभीर मुद्दे पर भी कुछ मीडिया प्लेटफॉर्म्स ने तथ्यों की जगह नैरेटिव को आगे बढ़ाने का प्रयास किया, जिससे जांच प्रक्रिया और जनभावनाओं दोनों पर असर पड़ा।
ब्लास्ट की शुरुआती जांच में जब सुरक्षा एजेंसियों ने कुछ सुरागों का खुलासा किया, तो कई मीडिया चैनलों ने बिना आधिकारिक पुष्टि के अफवाहें फैलाना शुरू कर दिया। कुछ रिपोर्ट्स में संदिग्ध संगठनों को लेकर बिना प्रमाण के दावे किए गए, वहीं कुछ ने घटना को राजनीतिक चश्मे से देखने की कोशिश की। इससे न केवल जांच में भ्रम पैदा हुआ बल्कि समाज में विभाजन की भावना को भी हवा मिली।
जानकारों का मानना है कि यह “नैरेटिव की साज़िश” सुनियोजित तरीके से की जाती है ताकि जनमत को प्रभावित किया जा सके। मीडिया का एक वर्ग अपनी विचारधारा या एजेंडा के अनुरूप खबरों को तोड़-मरोड़कर प्रस्तुत करता है, जिससे सच्चाई पीछे छूट जाती है।
देश की सुरक्षा से जुड़े ऐसे संवेदनशील मामलों में मीडिया की भूमिका बेहद जिम्मेदार होनी चाहिए। जब तक जांच पूरी न हो, तब तक किसी भी तरह का अनुमान या मनगढ़ंत कहानी समाज में भ्रम फैलाने का काम करती है। सच्चाई तक पहुँचने से पहले राय बनाना न केवल पत्रकारिता के सिद्धांतों के खिलाफ है, बल्कि यह राष्ट्रीय हितों को भी नुकसान पहुंचाता है।
वर्तमान दौर में जब सूचना माध्यमों की पहुंच हर नागरिक तक है, तब “फेक नैरेटिव” फैलाने की साज़िशें पहले से अधिक खतरनाक हो चुकी हैं। दिल्ली ब्लास्ट जैसी घटनाओं का उपयोग किसी भी राजनीतिक या वैचारिक लाभ के लिए करना समाज और देश दोनों के लिए घातक है।