भारत में लंग कैंसर तेजी से बढ़ा, पर स्क्रीनिंग ज़ीरो, क्या यह स्वास्थ्य आपातकाल नहीं?

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भारत में लंग कैंसर के मामलों में तेजी से बढ़ोतरी दर्ज की जा रही है, लेकिन देश-भर में इसकी स्क्रीनिंग लगभग नगण्य बनी हुई है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि बढ़ते मरीजों के बावजूद समय पर जांच की कमी एक गंभीर स्थिति पैदा कर रही है, जिसे स्वास्थ्य आपातकाल के रूप में देखने की आवश्यकता है।

चिकित्सकों के अनुसार, लंग कैंसर का सबसे बड़ा खतरा यह है कि यह ज्यादातर मामलों में देर से पकड़ा जाता है, जब उपचार के विकल्प सीमित हो जाते हैं। विकसित देशों में नियमित स्क्रीनिंग के माध्यम से शुरुआती चरण में कैंसर का पता लगाया जाता है, जिससे जीवनरक्षा दर कई गुना बढ़ जाती है। इसके विपरीत, भारत में न तो व्यापक स्क्रीनिंग कार्यक्रम है और न ही जोखिम वाले समूहों—जैसे धूम्रपान करने वालों, प्रदूषण के संपर्क में रहने वालों और औद्योगिक क्षेत्रों के श्रमिकों—के लिए कोई विशेष निगरानी व्यवस्था।

विशेषज्ञ बताते हैं कि भारत में प्रदूषण, तंबाकू सेवन और occupational hazards लंग कैंसर के प्रमुख कारण बन चुके हैं, लेकिन इन कारणों के अनुपात में स्वास्थ्य प्रणाली ने अभी तक प्रभावी कदम नहीं उठाए हैं। कई राज्यों में कैंसर डायग्नोसिस के लिए बुनियादी सुविधाएँ भी सीमित हैं, जिसके चलते रोग की पहचान देर से होती है।

सार्वजनिक स्वास्थ्य विश्लेषकों का कहना है कि लंग कैंसर की मौजूदा स्थिति चिंताजनक है और इसे ‘साइलेंट हेल्थ इमरजेंसी’ के रूप में देखा जाना चाहिए। विशेषज्ञ सरकार से राष्ट्रीय स्तर पर लंग कैंसर स्क्रीनिंग कार्यक्रम शुरू करने, प्रदूषण नियंत्रण के उपायों को कड़ा करने और तंबाकू नियंत्रण नीतियों को और प्रभावी बनाने की मांग कर रहे हैं।

बढ़ते मामलों और कम होती जागरूकता के बीच, भारत के लिए यह समय है कि वह लंग कैंसर को प्राथमिक स्वास्थ्य चुनौती के रूप में स्वीकार करे और व्यापक समाधान लागू करे, ताकि आने वाले वर्षों में इसकी भयावहता को रोका जा सके।

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