स्वच्छता में इंदौर की एक और जीत: लगातार 8वीं बार बना भारत का सबसे स्वच्छ शहर, सूरत दूसरे और नवी मुंबई तीसरे स्थान पर

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नई दिल्ली / इंदौर, 17 जुलाई 2025 — स्वच्छता की दौड़ में इंदौर ने एक बार फिर इतिहास रच दिया है। भारत सरकार द्वारा जारी ‘स्वच्छता सर्वेक्षण 2025’ के नतीजों में इंदौर ने लगातार 8वीं बार देश के सबसे स्वच्छ शहर का खिताब अपने नाम कर लिया है। यह केवल एक पुरस्कार नहीं, बल्कि इंदौर के नागरिकों, नगर निगम, सफाई कर्मियों और प्रशासन की साझा प्रतिबद्धता और सतत प्रयासों का प्रमाण है।

इस सूची में गुजरात का सूरत लगातार दूसरे स्थान पर बना हुआ है, जबकि नवी मुंबई ने शानदार प्रदर्शन करते हुए तीसरा स्थान हासिल किया है।

इंदौर की स्वच्छता की कहानी: जुनून, जनभागीदारी और जागरूकता
इंदौर की सफाई व्यवस्था अब मिसाल बन चुकी है। यह शहर न केवल कचरा प्रबंधन, सूखा-गीला कचरा पृथक्करण, प्लास्टिक नियंत्रण और नागरिक सहभागिता में अग्रणी रहा है, बल्कि ‘Zero Waste’ की दिशा में भी उल्लेखनीय पहल कर रहा है।

इंदौर में घर-घर से कचरा इकट्ठा किया जाता है, और उसे वैज्ञानिक तरीके से निपटाया जाता है। नगर निगम द्वारा “3R” यानी Reduce, Reuse, Recycle की नीति पर गंभीरता से अमल किया जाता है। यहां बायो-CNG प्लांट, कचरा प्रोसेसिंग यूनिट और साफ-सुथरी सार्वजनिक शौचालय व्यवस्था ने शहर को एक हरित और स्वच्छ मॉडल में बदल दिया है।

सूरत और नवी मुंबई: लगातार बेहतर होती रैंकिंग
सूरत, जो अब लगातार वर्षों से स्वच्छता सूची में शीर्ष 3 में बना हुआ है, वहां की स्मार्ट वॉटर ड्रेनेज सिस्टम, स्वच्छ बाजार क्षेत्र और वॉटर रिसाइक्लिंग पॉलिसी ने देशभर का ध्यान खींचा है।

वहीं नवी मुंबई, जो कभी पीछे छूट गया था, अब तेजी से स्वच्छता के क्षेत्र में अग्रसर हुआ है। वहां की मरीन वेस्ट मैनेजमेंट, ई-वेस्ट कलेक्शन ड्राइव, और बच्चों को स्कूल स्तर पर स्वच्छता की शिक्षा देने की पहलें उल्लेखनीय हैं।

केंद्रीय सरकार का दृष्टिकोण: प्रतिस्पर्धा से परिवर्तन
स्वच्छ भारत मिशन के तहत हर साल आयोजित होने वाले स्वच्छता सर्वेक्षण का उद्देश्य सिर्फ रैंकिंग देना नहीं है, बल्कि शहरों को जनभागीदारी और व्यवहार परिवर्तन के ज़रिए स्वच्छता की ओर प्रेरित करना है।

इस साल के सर्वेक्षण में 4500 से अधिक शहरों ने भाग लिया और 10 करोड़ से ज्यादा लोगों की प्रतिक्रियाएं ली गईं। सर्वेक्षण में सर्वाधिक वज़न नागरिक फीडबैक को दिया गया, जिससे स्पष्ट होता है कि जनता की भूमिका अब केवल उपभोक्ता की नहीं, बल्कि परिवर्तनकर्ता की हो चुकी है।

पुरस्कार का मतलब सिर्फ सम्मान नहीं
इंदौर की इस उपलब्धि को महज़ ट्रॉफी और प्रमाण पत्र तक सीमित नहीं देखा जाना चाहिए। यह उन सफाई कर्मियों की मेहनत, उन नागरिकों की समझदारी, और उस प्रशासनिक इच्छाशक्ति का फल है जिसने इंदौर को सिर्फ साफ नहीं, बल्कि जीने योग्य सबसे बेहतर शहरों में शामिल कर दिया है।

निष्कर्ष: क्या बाकी शहर सीखेंगे?
इंदौर ने एक बार फिर बता दिया है कि कोई भी शहर अगर ठान ले, तो वह कचरे से स्वर्ण तक का सफर तय कर सकता है। अब सवाल यह है — क्या बाकी शहर भी इस जज़्बे को अपनाएंगे? क्या हम अपने शहर को अगला इंदौर बनाने की हिम्मत दिखाएंगे?

क्योंकि अब स्वच्छता सिर्फ सरकार की जिम्मेदारी नहीं, यह हर नागरिक की पहचान बन चुकी है।

“स्वच्छ शहर, श्रेष्ठ जीवन” — और इंदौर इसका सबसे चमकता उदाहरण है।

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