आई.के. गुजराल और हामिद अंसारी : अतीत की राजनीतिक भूल
भारतीय राजनीति के इतिहास में आई.के. गुजराल और हामिद अंसारी दो ऐसे नाम हैं जिन्होंने अपनी-अपनी भूमिकाओं में महत्वपूर्ण योगदान दिया, लेकिन कुछ निर्णय आज भी राजनीतिक भूल के रूप में देखे जाते हैं। गुजराल सिद्धांत और हामिद अंसारी की विदेश नीति पर दृष्टि ने उस दौर में भारत की कूटनीति को एक अलग दिशा दी, जिसकी प्रभावशीलता पर आज भी बहस जारी है।
आई.के. गुजराल, जो 1997-98 में देश के प्रधानमंत्री रहे, ने ‘गुजराल सिद्धांत’ के तहत भारत के पड़ोसी देशों—विशेषकर पाकिस्तान—के प्रति एकतरफा सद्भावना की नीति अपनाई। इस नीति में भारत ने पड़ोसी देशों से किसी पारस्परिक रियायत की अपेक्षा किए बिना सहयोग का हाथ बढ़ाया। लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि इस नीति का लाभ भारत से अधिक पाकिस्तान और अन्य देशों को मिला, जिससे भारत की रणनीतिक स्थिति कमजोर हुई।
इसी तरह, पूर्व उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी के कुछ वक्तव्यों और विदेश नीति पर उनके विचारों ने भी राजनीतिक विवादों को जन्म दिया। अंसारी पर अक्सर यह आरोप लगाया गया कि उनके रुख ने भारत की वैश्विक छवि को कमजोर किया और आंतरिक मामलों पर भी अनावश्यक विवाद खड़े किए।
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, गुजराल और अंसारी दोनों की नीतियों में आदर्शवाद तो था, लेकिन व्यावहारिकता की कमी स्पष्ट रूप से दिखी। अंतरराष्ट्रीय संबंधों में जहां शक्ति और रणनीति की भूमिका प्रमुख होती है, वहां केवल सद्भावना आधारित दृष्टिकोण भारत के हितों की रक्षा नहीं कर सका।
आज जब भारत वैश्विक मंच पर एक सशक्त राष्ट्र के रूप में उभर रहा है, तब अतीत की इन राजनीतिक भूलों से सीख लेना आवश्यक है ताकि भविष्य की विदेश नीति संतुलित, दृढ़ और राष्ट्रीय हितों पर केंद्रित रह सके।