बिहार का जंगलराज़: लालू युग की स्याह यादें और फिर लौटने का डर

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बिहार की राजनीति में ‘जंगलराज़’ शब्द आज भी एक संवेदनशील और प्रभावशाली मुद्दा है। यह शब्द उन वर्षों की याद दिलाता है जब राज्य में कानून-व्यवस्था की स्थिति बेहद खराब मानी जाती थी, और अपराध, अपहरण, रंगदारी तथा राजनीतिक संरक्षण में पनपते माफियाओं का बोलबाला था। लालू प्रसाद यादव के शासनकाल को विपक्ष अक्सर इसी स्याह दौर के रूप में प्रस्तुत करता है।

1990 के दशक से लेकर 2005 तक बिहार में अपराध दर तेजी से बढ़ी। सड़क पर बढ़ते अपराध, व्यापारियों के अपहरण, और राजनीतिक हस्तक्षेप के कारण राज्य की छवि देशभर में नकारात्मक रूप से उभरी। विकास ठप पड़ गया और निवेशक बिहार से दूरी बनाने लगे। यही कारण है कि ‘जंगलराज़’ शब्द बिहार के आम जनमानस में भय और असुरक्षा का पर्याय बन गया।

आज, जब बिहार चुनावों की तैयारी कर रहा है, विपक्ष और सत्तापक्ष दोनों ही इस शब्द को राजनीतिक हथियार के रूप में इस्तेमाल कर रहे हैं। भाजपा और जदयू जैसे दल जनता को यह याद दिलाने की कोशिश कर रहे हैं कि अगर सत्ता बदली तो कहीं वही अराजकता दोबारा न लौट आए। वहीं, आरजेडी आधुनिक नेतृत्व, विकास और रोजगार के नए वादों के साथ अपनी पुरानी छवि बदलने का प्रयास कर रही है।

जनता के बीच अब भी यह सवाल गूंज रहा है कि क्या बिहार एक बार फिर पुराने दौर की ओर वापस जा सकता है या राज्य अब एक नए राजनीतिक और सामाजिक संतुलन की तरफ बढ़ चुका है। चुनावी माहौल में जंगलराज़ की यादें और उससे जुड़े भय मतदाताओं के फैसले को प्रभावित करने वाले प्रमुख कारकों में शामिल हैं।

बिहार का लोकतांत्रिक भविष्य इसी बात पर निर्भर करेगा कि जनता अतीत की स्याह यादों से प्रेरित होकर निर्णय लेती है या नए नेतृत्व के वादों पर भरोसा करती है।

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