विदेशी फंड से खड़ी की आलीशान बिल्डिंग, उसे आतंकी कैंप बनाने की थी साजिश… छांगुर बाबा को लेकर यूपी एटीएस का बड़ा खुलासा

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विदेशी फंड से खड़ी की आलीशान बिल्डिंग, उसे आतंकी कैंप बनाने की थी साजिश… छांगुर बाबा को लेकर यूपी एटीएस का बड़ा खुलासा

उत्तर प्रदेश में आतंकवाद विरोधी दस्ते (ATS) ने एक सनसनीखेज खुलासा करते हुए उस चेहरों को बेनकाब किया है, जो संत और समाजसेवी के मुखौटे में छिपकर देशविरोधी गतिविधियों को अंजाम देने की साजिश रच रहे थे। मामला है कथित ‘बाबा’ के नाम से मशहूर छांगुर बाबा का, जिसके आश्रम की आड़ में चल रही एक बड़ी साजिश को यूपी एटीएस ने विफल कर दिया है।

इस खुलासे ने न सिर्फ प्रशासनिक हलकों में हलचल मचा दी है, बल्कि आम जनता को भी हिला कर रख दिया है कि एक साधु की छवि में छुपा शख्स किस कदर खतरनाक एजेंडे को जमीन पर उतारने की तैयारी में था।

आलीशान आश्रम या आतंकी अड्डा?
छांगुर बाबा ने जिस विशाल भवन या आश्रम को खड़ा किया था, वह बाहर से देखने में किसी धर्मस्थल से कम नहीं था। आधुनिक सुविधाओं से लैस, चारों ओर सीसीटीवी कैमरे, ऊंची चारदीवारी, और अंदर अत्याधुनिक सुरंगनुमा कमरे — यह सब देखकर स्थानीय लोग भी हैरान थे। उन्हें लगता था कि बाबा कोई बड़ा योगगुरु है या कोई आध्यात्मिक संस्था चला रहा है।

मगर यूपी एटीएस की जांच में सामने आया कि यह भवन विदेशी फंडिंग से बनाया गया था। पैसों का स्रोत मध्य एशियाई और खाड़ी देशों से था, जो संदिग्ध व्यक्तियों के नाम पर भारत भेजा गया। इसका उपयोग न तो धार्मिक कार्यों के लिए था, न ही जनकल्याण के लिए — बल्कि आतंकी गतिविधियों के ट्रेनिंग कैंप के रूप में इस्तेमाल की योजना बनाई गई थी।

बाबा की असल पहचान: न साधु, न संत
ATS की रिपोर्ट के अनुसार, छांगुर बाबा न तो किसी वैदिक परंपरा से जुड़ा संत था, और न ही किसी धार्मिक मठ का उत्तराधिकारी। उसकी असल पहचान कई फर्जी दस्तावेजों के पीछे छुपी हुई थी। पासपोर्ट, आधार कार्ड, और भूमि दस्तावेज — सब फर्जी या बोगस नामों से बनाए गए थे। जांच में यह भी सामने आया कि बाबा का संपर्क कई ऐसे लोगों से था, जो पहले से देश विरोधी गतिविधियों में लिप्त रहे हैं।

बाबा की गतिविधियों में कट्टरपंथी विचारों का प्रचार, स्थानीय युवाओं को ‘वैकल्पिक सोच’ के नाम पर भड़काना, और गुप्त बैठकों का आयोजन करना शामिल था। कुछ मामलों में उसने युवाओं को विदेश ले जाने का झांसा भी दिया।

विदेशी फंडिंग की साज़िश: चैनलों के ज़रिए पैसे का खेल
एटीएस को मिले दस्तावेज़ों और इलेक्ट्रॉनिक डिवाइसेज़ से यह साफ हुआ कि विदेशी फंडिंग हवालों, क्रिप्टो ट्रांजैक्शनों और एनजीओ के बहाने भारत में ट्रांसफर की गई थी। ये फंड न सिर्फ भवन निर्माण के लिए इस्तेमाल हुए, बल्कि प्रचार, भर्ती और उपकरणों की खरीद के लिए भी।

जांच एजेंसियों को आशंका है कि छांगुर बाबा केवल एक मोहरा था — उसके पीछे एक बड़ा नेटवर्क काम कर रहा था जो भारत के शांत क्षेत्रों में जड़ें जमाने की कोशिश कर रहा था।

क्या चल रहा था आश्रम के अंदर?
ATS की छानबीन में आश्रम की तलाशी के दौरान जो मिला वह चौंकाने वाला था—ड्रोन उड़ाने की किट, जीपीएस सिस्टम, नकली आधार कार्ड बनाने वाले उपकरण, संदिग्ध मोबाइल सिम, और एक अज्ञात भाषा में लिखे दस्तावेज़। इसके साथ ही, दीवारों पर चढ़ने की ट्रेनिंग देने वाले रस्से और क्लाइंबिंग गियर भी बरामद हुए।

कई कमरों को साउंडप्रूफ बनाया गया था और कुछ में खुफिया रास्ते थे, जिन्हें सामान्य तौर पर कोई बाहर से देख नहीं सकता था। यह पूरी तरह से एक आतंकी ट्रेनिंग कैंप की संरचना थी, जिसे धीरे-धीरे एक्टिवेट किया जाना था।

स्थानीय लोगों की भूमिका और सवाल
सबसे बड़ा सवाल ये उठता है कि इतने लंबे समय तक बाबा की गतिविधियों पर किसी की नजर क्यों नहीं पड़ी? क्या स्थानीय पुलिस प्रशासन की लापरवाही थी, या फिर बाबा ने लोगों को अपनी ‘धार्मिक छवि’ से इतना प्रभावित कर रखा था कि किसी ने शक ही नहीं किया?

कुछ स्थानीय लोगों ने अब दावा किया है कि उन्हें बाबा की गतिविधियाँ कुछ अजीब लगती थीं — वह बच्चों को अकेले में ले जाता था, बाहर से आए लोगों को लंबे समय तक आश्रम में रखता था, और कभी किसी को अंदर जाने की इजाजत नहीं देता था।

एटीएस का ऐक्शन और आगे की रणनीति
यूपी एटीएस ने छांगुर बाबा को गिरफ्तार कर लिया है और उसके खिलाफ UAPA (Unlawful Activities Prevention Act) के तहत मामला दर्ज किया गया है। उसके मोबाइल और लैपटॉप की फॉरेंसिक जांच जारी है, जिससे पता लगाया जा सके कि इस नेटवर्क के तार किन राज्यों और देशों से जुड़े हैं।

केंद्रीय एजेंसियों को भी इस मामले की जानकारी दे दी गई है और इंटरपोल से भी संपर्क साधा गया है ताकि विदेशों में बैठे उसके फंडिंग स्रोतों तक पहुंचा जा सके।

निष्कर्ष: नकाब उतर रहे हैं, लेकिन सतर्क रहना जरूरी
छांगुर बाबा का मामला हमें एक कड़वा सबक देता है कि आतंक अब केवल सीमाओं से नहीं आता, वह भीतर भी जन्म ले सकता है—वो भी धर्म, सेवा और आध्यात्मिकता के नाम पर। ऐसे मामलों में समाज की सतर्कता, प्रशासन की चौकसी और नागरिकों की सजगता बेहद आवश्यक है।

कभी-कभी असली खतरनाक दुश्मन वह होता है जो दोस्त की तरह दिखता है। छांगुर बाबा का खुलासा इसी बात का प्रतीक है — और हमें याद दिलाता है कि सिर्फ पोशाक नहीं, पहचान भी जांचनी चाहिए।

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