ईश्वर की अधूरी तस्वीर: वेटिकन क्यों डरता है देवी से?
ईश्वर की अधूरी तस्वीर: जब देवी को भुला दिया गया
मानव सभ्यता की शुरुआत में ‘ईश्वर’ की अवधारणा केवल पुरुष तक सीमित नहीं थी। प्राचीन काल में देवी—मातृशक्ति—को सृष्टि की जननी, पोषक और रक्षक के रूप में पूजा जाता था। लेकिन धीरे-धीरे जैसे-जैसे संगठित धर्मों और सत्ता संरचनाओं का विकास हुआ, स्त्री स्वरूप की यह दिव्यता पीछे छूट गई। आज यह सवाल उठना स्वाभाविक है — क्या ईश्वर की तस्वीर अधूरी है क्योंकि उसमें ‘देवी’ को स्थान नहीं मिला?
वेटिकन और स्त्री देवत्व का विरोध
वेटिकन सिटी, जो कि रोमन कैथोलिक चर्च का केंद्र है, ने सदियों से ईश्वर को केवल “He” या “Father” के रूप में प्रस्तुत किया है। चर्च की संरचना पूरी तरह पुरुष प्रधान है — पोप, कार्डिनल, बिशप, सभी पद पुरुषों के पास हैं। महिला को “नन” के रूप में सीमित भूमिका दी गई, परंतु आध्यात्मिक नेतृत्व से हमेशा दूर रखा गया। यही कारण है कि जब भी कोई “Divine Feminine” यानी देवी शक्ति की बात करता है, वेटिकन असहज हो उठता है।
मातृशक्ति की अवधारणा और उसका दमन
प्राचीन मिस्र, भारत, यूनान, और सुमेरिया जैसी सभ्यताओं में देवी का स्थान सर्वोच्च था — कभी वह दुर्गा थी, कभी आइसिस, कभी अथेना। इन सभ्यताओं में सृजन का स्रोत ‘स्त्री’ को माना गया। लेकिन जब पितृसत्तात्मक धार्मिक संरचनाएँ उभरीं, तो देवी का स्वरूप धीरे-धीरे गायब कर दिया गया। ईसाई धर्म में भी ‘मैरी’ का आदर हुआ, पर उसे ‘देवी’ का दर्जा कभी नहीं दिया गया।
डर या सत्ता की रक्षा?
वेटिकन का देवी से डर दरअसल सत्ता खोने का भय है। देवी का अर्थ है स्वतंत्रता, सृजन और करुणा — जो किसी भी धार्मिक सत्ता को चुनौती दे सकती है। अगर ईश्वर को स्त्री रूप में स्वीकार कर लिया जाए, तो पुरोहित वर्ग की पुरुषप्रधान व्याख्या कमजोर पड़ जाएगी। इसलिए देवी को प्रतीकात्मक रूप में स्वीकार किया गया, पर वास्तविक रूप में नहीं।
भारत और देवी का संतुलन
भारतीय परंपरा में देवी और देव, दोनों को समान रूप से पूजा जाता है। शक्ति और शिव का संतुलन सृष्टि का आधार माना गया है। यही कारण है कि भारतीय दर्शन में ईश्वर कभी अधूरा नहीं दिखता — क्योंकि यहाँ वह केवल ‘पुरुष’ नहीं, ‘स्त्री’ भी है।
ईश्वर की पूर्णता: देवी का स्वीकार
जब तक देवी को ईश्वर के रूप में मान्यता नहीं मिलेगी, तब तक ईश्वर की तस्वीर अधूरी रहेगी। वेटिकन जैसी संस्थाओं को यह स्वीकार करना होगा कि सृष्टि का आध्यात्मिक सत्य केवल पुरुष के माध्यम से नहीं, बल्कि स्त्री के माध्यम से भी प्रवाहित होता है। और यही स्वीकारोक्ति मानवता को एक संतुलित, समग्र और करुणामय आध्यात्मिक दिशा दे सकती है।