अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने ट्रंप के वैश्विक टैरिफ की वैधता पर उठाए गंभीर सवाल

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अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा लगाए गए वैश्विक टैरिफ की वैधता पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े कर दिए हैं। ट्रंप प्रशासन ने अपने कार्यकाल में राष्ट्रीय सुरक्षा का हवाला देते हुए कई देशों से आयातित स्टील, एल्युमिनियम और अन्य उत्पादों पर भारी टैरिफ लगाए थे। इन टैरिफों ने न केवल वैश्विक व्यापार को प्रभावित किया बल्कि अमेरिका के साझेदार देशों के साथ व्यापारिक तनाव भी बढ़ा दिया था।

सुप्रीम कोर्ट में कई याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि राष्ट्रपति ने 1962 के ट्रेड एक्सपैंशन एक्ट की गलत व्याख्या करते हुए अपनी शक्तियों का अतिक्रमण किया। उनका कहना है कि इस कानून का उद्देश्य सुरक्षा से जुड़े वास्तविक खतरों को संबोधित करना था, न कि व्यापक रूप से आर्थिक प्रतिस्पर्धा को राष्ट्रीय सुरक्षा के दायरे में शामिल करना।

न्यायाधीशों ने सुनवाई के दौरान यह सवाल उठाया कि क्या कार्यकारी शाखा को इतने व्यापक अधिकार दिए जा सकते हैं कि वह राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर किसी भी उत्पाद पर किसी भी देश से अनियंत्रित टैरिफ लगा दे। कोर्ट ने संकेत दिया कि इस प्रकार की व्याख्या कांग्रेस की भूमिका और अमेरिकी संविधान में शक्ति संतुलन को कमजोर कर सकती है।

ट्रंप प्रशासन का तर्क है कि बदलते वैश्विक परिदृश्य में अमेरिका को अपनी औद्योगिक क्षमता और आर्थिक सुरक्षा को बचाने के लिए टैरिफ लगाना आवश्यक था। वहीं, आलोचकों का कहना है कि इन टैरिफों ने अमेरिकी उपभोक्ताओं और उद्योगों पर आर्थिक बोझ बढ़ाया और वैश्विक व्यापार प्रणाली में अनिश्चितता पैदा की।

विशेषज्ञों के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट का अंतिम फैसला न केवल अमेरिका की व्यापार नीतियों को प्रभावित करेगा, बल्कि भविष्य में किसी भी राष्ट्रपति की शक्तियों की सीमा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। यह मामला अमेरिका के वैश्विक आर्थिक संबंधों और व्यापारिक रणनीतियों पर दूरगामी असर डाल सकता है।

अब फैसला आने तक यह बहस जारी रहेगी कि क्या राष्ट्रीय सुरक्षा का दायरा इतना व्यापक हो सकता है कि वह आर्थिक नीतियों के हर पहलू को अपने भीतर समेट ले, या फिर इसके लिए स्पष्ट संवैधानिक सीमा तय होनी चाहिए।

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