बिहार 2025 टिकट बंटवारा: जातीय रणनीति का पर्दाफाश – प्रतिनिधित्व या समीकरण?

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बिहार के विधानसभा चुनाव 2025 की तैयारियाँ जोरों पर चल रही हैं, और टिकट बंटवारे में जातीय समीकरण एक बार फिर गहराई से सामने आ रहे हैं। राज्य की सियासत में यह कोई नया विषय नहीं है, लेकिन इस बार का टिकट वितरण कुछ ऐसे सवाल खड़े कर रहा है, जो राजनीतिक दलों के उद्देश्य और विचारधारा पर सीधा प्रहार कर रहे हैं।

चाहे सत्तारूढ़ एनडीए गठबंधन हो या विपक्षी महागठबंधन, दोनों ही पक्ष जातीय आधारित प्रतिनिधित्व की नीति को आगे बढ़ाते हुए दिस रहे हैं। यह साफ़ झलकता है कि उम्मीदवारों के चयन में जातीय गणित और वोट बैंक की मजबूती का ध्यान अधिक रखा गया है, बजाय राजनीतिक कार्यों या विकास की दृष्टि के।

विशेषकर, कुछ जातियों को बड़े पैमाने पर टिकट दिए जाने और कुछ को हाशिये पर रखने को लेकर समाज के भीतर बहस तेज हो गई है। दलित, ओबीसी, मुसलमान और सामान्य वर्ग के उम्मीदवारों के चयन में असंतुलन की बात भी बार-बार उठ रही है। इस पर कई सामाजिक कार्यकर्ताओं और राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि यह रणनीति केवल वोटों के ध्रुवीकरण के लिए है, न कि वास्तविक सामाजिक न्याय या प्रतिनिधित्व के लिए।

इसके विपरीत, दलों का तर्क है कि उनके टिकट वितरण में सामाजिक संतुलन का ध्यान रखा गया है और वे सभी वर्गों को समान भागीदारी देने के पक्ष में हैं। इस मुद्दे पर जनता की प्रतिक्रिया मिली-जुली है, जहाँ कुछ इसे राजनीतिक यथार्थ मान रहे हैं, वहीं कई इसे लोकतांत्रिक मूल्यों और सामाजिक बराबरी के विपरीत मानते हैं।

अब देखने वाली बात यह होगी कि यह जातीय-आधारित टिकट रणनीति चुनावी नतीजों में किस हद तक कामयाब होती है और इसका राज्य की भावी राजनीति पर क्या असर पड़ेगा।

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