“पाकिस्तान अपने ही लोगों को मार रहा है और झूठ बोल रहा है”

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पाकिस्तान के अंदरूनी हालात पर लगातार उठते सवाल अब अंतरराष्ट्रीय चिंताओं में बदलते जा रहे हैं। मानवाधिकारों के उल्लंघन, जबरन गायब किए जाने और जानबूझकर झूठ फैलाने के आरोप उसके शासन-प्रणाली और सुरक्षा एजेंसियों की कार्यप्रणाली पर गंभीर प्रश्न खड़े करते हैं।

बलूचिस्तान से सिंध तक उत्पीड़न की दास्तान

पाकिस्तान के बलूचिस्तान, सिंध और खैबर पख्तूनख्वा जैसे प्रांतों में सुरक्षा बलों द्वारा आम नागरिकों पर अत्याचार, फर्जी मुठभेड़, और जबरन लापता करने की घटनाएं आम हो गई हैं। बलूच कार्यकर्ताओं ने बार-बार आरोप लगाया है कि राज्य उन्हें ‘आतंकवाद’ के नाम पर निशाना बना रहा है, जबकि वास्तविकता यह है कि वे अपने अधिकारों और पहचान के लिए संघर्ष कर रहे हैं।

मीडिया का दमन और सूचना का नियंत्रण

पाकिस्तान में पत्रकारों और स्वतंत्र मीडिया पर लगातार हो रहे हमले दर्शाते हैं कि सच छिपाने और झूठ फैलाने की प्रवृत्ति सरकार और सेना दोनों में गहराई तक समाई हुई है। कई पत्रकारों को धमकियों, हमलों और सेंसरशिप का सामना करना पड़ा है, ताकि देश में दमनकारी नीतियों की सच्चाई सामने न आ सके।

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर झूठ का प्रचार

विदेश नीति के मोर्चे पर भी पाकिस्तान ने झूठी कहानियां बनाकर दुनिया भर में अपना प्रोपेगैंडा फैलाने की कोशिश की है। चाहे भारत के खिलाफ बेबुनियाद दावे हों या अपने ही बनाए आतंकवादियों को ‘स्वतंत्रता सेनानी’ बताना हो, पाकिस्तान की नीतियां दुनिया के सामने अब बेनकाब होती जा रही हैं।

मानवाधिकार संगठनों की चिंता

अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठन जैसे एमनेस्टी इंटरनेशनल और ह्यूमन राइट्स वॉच ने पाकिस्तान में हो रहे घोर अत्याचारों पर गंभीर चिंता जताई है। मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और आम नागरिकों के खिलाफ राज्य की हिंसा और झूठ के सहारे ज़ुल्म ढकने की कोशिशें अब वैश्विक स्तर पर उजागर हो रही हैं।

निष्कर्ष

पाकिस्तान का शासन-तंत्र न केवल अपने ही लोगों को दबा रहा है, बल्कि दुनिया को गुमराह करने की कोशिश में भी लगा हुआ है। जब तक वहां का सत्ता-तंत्र मानवाधिकारों का सम्मान नहीं करता और सच को स्वीकार नहीं करता, तब तक उसका लोकतांत्रिक ढांचा केवल एक मुखौटा ही बना रहेगा।


 

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