चमचमाती स्कॉर्पियो कार और ब्ला-ब्ला ऐप पर बुकिंग… SDM बनकर वारदात, यूपी के फर्जी IAS की कहानी

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भारत में फर्जीवाड़े की कहानियाँ अक्सर फिल्मी लगती हैं, लेकिन कभी-कभी हकीकत इतना चौंकाती है कि वह किसी स्क्रिप्ट से कम नहीं लगती। उत्तर प्रदेश से सामने आई एक ऐसी ही हैरान कर देने वाली घटना ने न केवल प्रशासन को झकझोर दिया, बल्कि आम जनता को भी सोचने पर मजबूर कर दिया कि दिखावा और वर्दी के नाम पर आज भी लोग कितनी आसानी से गुमराह हो जाते हैं।

यह कहानी है एक फर्जी IAS अधिकारी की, जिसने चमचमाती स्कॉर्पियो, सजे-संवरे कपड़े और सरकारी अधिकारी जैसी बॉडी लैंग्वेज के दम पर महीनों तक SDM बनकर लोगों को धोखा दिया। और दिलचस्प बात ये रही कि उसने सफर के लिए इस्तेमाल किया एक आम कैब एप—ब्ला-ब्ला ऐप, जिससे वह यात्रा करता था जैसे कोई अधिकारी सरकारी वाहन में दौरा कर रहा हो।

स्कॉर्पियो में घूमता था जैसे कलेक्टर हो
उत्तर प्रदेश के कई जिलों में ये फर्जी IAS अफसर खुद को “SDM” बताकर न केवल सरकारी दफ्तरों में घुसता था, बल्कि पुलिस और प्रशासन के बीच अपनी पकड़ दिखाने के लिए चमचमाती स्कॉर्पियो गाड़ी का इस्तेमाल करता था। गाड़ी पर लाल बत्ती नहीं थी, लेकिन चाल-ढाल ऐसी कि लोग बगैर सवाल किए सलाम ठोक देते।

उसका पहनावा हमेशा सफेद कुर्ता-पायजामा या खादी का बंदगला होता, और मोबाइल पर लगातार ‘मीटिंग कॉल्स’ करने का नाटक चलता रहता। किसी को शक न हो, इसके लिए वह कभी-कभी दो-चार फोन भी साथ रखता।

ब्ला-ब्ला ऐप बना उसकी ‘सरकारी सवारी’
जहां ज्यादातर लोग मानते हैं कि सरकारी अफसरों के पास अपनी गाड़ियाँ और ड्राइवर होते हैं, वहीं इस शातिर दिमाग ने आम कैब ऐप—ब्ला-ब्ला—का इस्तेमाल कर लोगों को भ्रमित किया। वह ऐप पर सफर बुक करता, और ड्राइवर को यह बताता कि वह एक सरकारी अधिकारी है जो कुछ संवेदनशील मामलों पर काम कर रहा है, इसलिए बातों को गोपनीय रखा जाए।

कई ड्राइवर तो उसके स्टाइल और बोलचाल से इतने प्रभावित हुए कि खुद ही उसकी कहानियों पर विश्वास करने लगे। रास्ते में वह खुद को किसी जिले का SDM, किसी जिले का ट्रेनिंग पर गया IAS या ‘स्पेशल ऑब्जर्वर’ बताता। उसका आत्मविश्वास ही उसका हथियार था।

वारदातें: अधिकारियों से मिलना, रौब झाड़ना, सुविधाएँ लेना
फर्जी IAS होने के नाते वह कई बार थानों, तहसीलों और जिलाधिकारियों के कार्यालयों में पहुंच जाता। वहां अधिकारियों और कर्मचारियों से ‘निरीक्षण’ के नाम पर फाइलें मंगवाता, खानपान की व्यवस्था करवाता और सरकारी गेस्ट हाउसों में रुकने की कोशिश करता। कभी-कभी किसी योजना की समीक्षा के नाम पर ग्रामीणों को बुलाकर भाषण भी देता।

कुछ स्थानों पर उसने अधिकारियों से ‘गुप्त सूचना’ के नाम पर जानकारियाँ भी जुटाईं और एक-दो जगह छोटी रिश्वत की मांग तक की, यह कहकर कि वह उच्च स्तरीय रिपोर्ट बना रहा है।

असली अधिकारियों को हुआ शक, फिर खुला राज़
सभी घटनाओं में उसके बात करने का तरीका एक जैसा होता, लेकिन धीरे-धीरे कुछ अधिकारियों को संदेह हुआ क्योंकि किसी भी आधिकारिक पत्राचार या शासनादेश में उसका नाम नहीं आता था। एक जिला अधिकारी ने जब उसके पदस्थापन और आईएएस कैडर की पुष्टि के लिए मुख्य सचिव कार्यालय से संपर्क किया, तब मामला पूरी तरह खुला।

जांच में पता चला कि यह शख्स किसी भी सरकारी सेवा में नहीं है। उसके खिलाफ तत्काल एफआईआर दर्ज की गई और पुलिस ने उसे एक गेस्ट हाउस से गिरफ्तार कर लिया, जहां वह VIP सुविधा में रुका था।

फर्जीवाड़े की वजह: दिखावा, लालच या मानसिक रोग?
पुलिस जांच में यह भी सामने आया कि आरोपी पढ़ा-लिखा था लेकिन बेरोजगार। वह हमेशा से ‘अफसर बनकर सम्मान पाने’ का सपना देखता था, लेकिन UPSC जैसी परीक्षा पास नहीं कर सका। सोशल मीडिया और फिल्मों से प्रभावित होकर उसने सोचा कि यदि वह बाहरी हाव-भाव और भाषा में अफसर लग सकता है, तो लोग खुद ही उस पर विश्वास करेंगे—और वही हुआ भी।

कुछ मनोवैज्ञानिक इसे “इंपोस्टर सिंड्रोम का रिवर्स केस” भी बता रहे हैं—जहां व्यक्ति असल में कुछ नहीं होता लेकिन खुद को उस पहचान में जीता है।

निष्कर्ष: आंख बंद कर न करें भरोसा
यह घटना हमें बताती है कि भारत जैसे देश में जहां पद, रुतबे और वर्दी को बहुत महत्व दिया जाता है, वहां केवल दिखावे से भी लोग भरोसा कर बैठते हैं। यह जरूरी है कि हम हर किसी पर बिना प्रमाण विश्वास न करें, खासकर जब बात सरकारी कामकाज या अधिकारी से जुड़ी हो।

आज फर्जी IAS बनने वाला वह युवक सलाखों के पीछे है, लेकिन उसकी कहानी लोगों को यह सिखा गई कि असली पहचान दस्तावेजों में होती है, न कि स्कॉर्पियो या सूट-बूट में।

किसी ने ठीक ही कहा है — “धोखा हमेशा भरोसे के भेष में आता है।

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