मुनीर की थाली पर जयशंकर-थरूर की डिप्लोमेसी भारी… पहलगाम का खलनायक, PAK-चीन का ‘लाडला’, TRF यूएस टेरर लिस्ट में कैसे आया?
हाल के दिनों में भारत की कूटनीति ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि शब्दों की धार तलवार से कम नहीं होती। पाकिस्तानी जनरल असीम मुनीर, जो खुद को शक्ति का प्रतीक मानते हैं और कश्मीर में भारत के खिलाफ छद्म युद्ध की रणनीतियों के लिए कुख्यात हैं, आज वैश्विक मंच पर सवालों के घेरे में हैं। भारत के दो प्रमुख नेताओं—विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर और कांग्रेस सांसद शशि थरूर—की संयुक्त कूटनीतिक चतुराई ने TRF (द रेजिस्टेंस फ्रंट) जैसे आतंकी संगठन को अमेरिका की वैश्विक आतंकवादी सूची में शामिल करवा दिया।
TRF: आतंकी फ्रंट जिसे ‘गुलदस्ता’ समझा गया
TRF यानी ‘द रेजिस्टेंस फ्रंट’, लश्कर-ए-तैयबा का एक नया मुखौटा संगठन है जिसे 2019 में जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाए जाने के बाद तेजी से सक्रिय किया गया। इसका उद्देश्य कश्मीर घाटी में आतंक का नया चेहरा बनकर, पाकिस्तान की भूमिका को छिपाते हुए स्थानीय ‘नाराजगी’ के नाम पर हिंसा को बढ़ावा देना था। TRF का सरगना रऊफ असगर, और उसके बाद शमीम अहमद बना, जिसे कई बार पहलगाम और कुलगाम से जोड़कर देखा गया—जहां युवाओं को भड़काकर आतंकी गतिविधियों में झोंका गया।
पहलगाम का खलनायक: आतंक की घाटी में जन्मा
TRF की गतिविधियों के पीछे जिन लोगों का नाम सामने आया है, उनमें कई ऐसे हैं जो दक्षिण कश्मीर के पहलगाम और पुलवामा क्षेत्रों से संबंध रखते हैं। यह वही इलाका है जहां अमरनाथ यात्रा पर हमले की साजिशें रची गईं, और जहां स्थानीय युवाओं को सोशल मीडिया, प्रचार वीडियो और धर्म के नाम पर उकसाया गया। पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी ISI ने TRF को एक ‘लोकल’ आंदोलन की शक्ल देकर उसे अंतरराष्ट्रीय निंदा से बचाने की कोशिश की।
PAK-चीन का ‘लाडला’: जिसे बचाने जुटा पूरा तंत्र
TRF को वैश्विक आतंकी सूची में लाने की प्रक्रिया में सबसे बड़ी बाधा चीन रहा है। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में जब भारत ने TRF और उससे जुड़े लोगों को आतंकी घोषित करने के लिए प्रस्ताव लाया, तो चीन ने बार-बार वीटो पावर का उपयोग कर इसे रोका। पाकिस्तान का रक्षा प्रतिष्ठान, खासकर जनरल असीम मुनीर, TRF को भारत में अस्थिरता का हथियार मानता है, इसलिए वह इसकी हर कीमत पर रक्षा करना चाहता है।
चीन का TRF के साथ यह ‘अदृश्य गठजोड़’ केवल भू-राजनीतिक नहीं है, बल्कि चीन की बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (BRI) के तहत CPEC (चाइना-पाकिस्तान इकोनॉमिक कॉरिडोर) की सुरक्षा को लेकर भी जुड़ा हुआ है। पाकिस्तान चाहता है कि कश्मीर का मुद्दा जिंदा रहे ताकि वह भारत को वैश्विक मंचों पर घेर सके, और चीन चाहता है कि उसका रणनीतिक निवेश दक्षिण एशिया में सुरक्षित बना रहे।
जयशंकर-थरूर की डिप्लोमेसी: जब संसद से लेकर संयुक्त राष्ट्र तक गूंजा भारत
डॉ. एस. जयशंकर ने एक ओर जहां वैश्विक मंचों पर भारत के तर्कों को तार्किक और तथ्यों पर आधारित रूप में प्रस्तुत किया, वहीं शशि थरूर ने अंग्रेज़ी में भारत की ‘सॉफ्ट पावर’ और बौद्धिक कूटनीति को नई दिशा दी। जब भारत ने TRF को अमेरिकी टेरर लिस्ट में शामिल करवाने की कोशिश की, तो यह केवल सुरक्षा एजेंसियों की रिपोर्ट पर आधारित कार्रवाई नहीं थी—यह एक सुनियोजित कूटनीतिक प्रयास था जिसमें संसद से लेकर अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों तक भारत की आवाज़ को मजबूती से रखा गया।
अमेरिका ने TRF को “लश्कर का नया चेहरा” मानते हुए इसे वैश्विक आतंकी संगठन घोषित किया। इस घोषणा में TRF के जम्मू-कश्मीर में किए गए हमलों, मारे गए आम नागरिकों और सुरक्षा बलों पर किए गए हमलों का ज़िक्र किया गया। भारत की इन कोशिशों ने यह दिखा दिया कि वह केवल सीमा पर नहीं, बल्कि कूटनीति के हर मोर्चे पर तैयार है।
निष्कर्ष: कूटनीति का बदला हुआ मिजाज
आज भारत की कूटनीति केवल विरोध दर्ज कराने तक सीमित नहीं है। यह अब रणनीति, तथ्य, वैश्विक गठजोड़ और बहुपक्षीय मंचों पर प्रभाव बनाने की ओर बढ़ चुकी है। असीम मुनीर भले ही पाकिस्तानी सेना की कमान संभालते हों, लेकिन उनकी रणनीतियां आज अंतरराष्ट्रीय दबाव में हैं। TRF को अमेरिका की आतंकी सूची में शामिल करवाना केवल एक प्रतीक नहीं, बल्कि उस बदलती भारतीय रणनीति का हिस्सा है जो अब “थाली की राजनीति” से निकलकर “पटल की नीति” तक पहुंच चुकी है।
जहां एक ओर पाकिस्तान आतंक के नए-नए नकाब बदलता है, वहीं भारत अब उन नकाबों को पहचानकर, दुनिया को उनका असली चेहरा दिखा रहा है। यह सिर्फ TRF की बात नहीं है—यह उस सोच की जीत है, जिसमें एक लोकतंत्र आतंक के हर रूप को उजागर कर वैश्विक समर्थन से निपटना जानता है।