बिहार में चल रहे विशेष सर्वेक्षण रिपोर्ट (SIR) को लेकर एक हैरान करने वाला मामला सामने आया है। सुप्रीम कोर्ट में इस रिपोर्ट की वैधता पर सुनवाई के दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने ऐसा खुलासा किया, जिसने सभी को चौंका दिया। उन्होंने अदालत को बताया कि बिहार के एक ही क्षेत्र में 12 ऐसे लोग हैं, जो असल में जीवित हैं, लेकिन सरकारी रिकॉर्ड में उन्हें मृत घोषित कर दिया गया है।
सिब्बल ने दलील दी कि यह केवल एक क्षेत्र का मामला है, जबकि पूरे राज्य में ऐसे कई उदाहरण हो सकते हैं। उन्होंने कहा, “जब आधिकारिक सर्वेक्षण में जीवित लोगों को मृत बताया जा रहा है, तो इससे पूरी रिपोर्ट की विश्वसनीयता पर सवाल उठता है।” उनका तर्क था कि इस तरह की गलतियां सीधे तौर पर नागरिकों के अधिकारों और सरकारी योजनाओं में उनकी पात्रता पर असर डाल सकती हैं।
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने इस पर गंभीरता दिखाई। न्यायमूर्ति की पीठ ने सवाल किया, “अगर यह लोग वास्तव में जीवित हैं, तो वे खुद कोर्ट में मौजूद क्यों नहीं हैं? उनकी प्रत्यक्ष गवाही से मामला और स्पष्ट हो सकता था।” कोर्ट ने यह भी कहा कि ऐसे गंभीर आरोपों की पुष्टि के लिए ठोस साक्ष्य जरूरी हैं, ताकि प्रशासनिक लापरवाही या संभावित भ्रष्टाचार का सही आकलन हो सके।
इस बहस के बीच यह मुद्दा भी उठा कि बिहार SIR का उद्देश्य राज्य की सामाजिक-आर्थिक स्थिति का सही आकलन करना था, लेकिन अगर रिपोर्ट में इस तरह की मूलभूत गलतियां होंगी, तो पूरे सर्वे की पारदर्शिता पर सवाल खड़े होंगे।
विशेषज्ञों का मानना है कि सरकारी सर्वेक्षणों में ऐसी गड़बड़ियां अक्सर स्थानीय स्तर पर डेटा एंट्री, सत्यापन प्रक्रिया या भ्रष्टाचार के कारण होती हैं। लेकिन जब मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच जाए, तो यह केवल एक प्रशासनिक चूक नहीं, बल्कि व्यवस्था की विश्वसनीयता का सवाल बन जाता है।
सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में आगे की सुनवाई के लिए राज्य सरकार और संबंधित अधिकारियों से जवाब मांगा है। अब देखना होगा कि इन 12 ‘मृत घोषित’ लेकिन असल में जीवित लोगों का सच अदालत में कैसे सामने आता है और इसका असर बिहार SIR पर क्या पड़ता है।
अगर आप चाहें तो मैं इसका एक अधिक राजनीतिक विश्लेषण वाला संस्करण भी लिख सकता हूं, जिसमें इस विवाद के संभावित चुनावी और सामाजिक असर को जोड़ा जाएगा।
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